श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 197
 
 
श्लोक  3.5.197 
ত্রাহি ত্রাহি অজ-ভব-বন্দ্য-শ্রী-চরণ!
ত্রাহি ত্রাহি সন্ন্যাস-ধর্মের বিভূষণ!
त्राहि त्राहि अज-भव-वन्द्य-श्री-चरण!
त्राहि त्राहि सन्न्यास-धर्मेर विभूषण!
 
 
अनुवाद
"हे प्रभु, जिनके चरणकमलों की ब्रह्मा और शिव पूजा करते हैं, मुझे बचाइए! हे संन्यास आश्रम के आभूषण, मुझे बचाइए!
 
"O Lord, whose feet are worshipped by Brahma and Shiva, save me! O ornament of the ascetic order, save me!
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)