श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 184
 
 
श्लोक  3.5.184 
এতেকে ক্ষমহ প্রভু, মোর অপরাধ
নিজ-দাস করি’ মোরে করহ প্রসাদ”
एतेके क्षमह प्रभु, मोर अपराध
निज-दास करि’ मोरे करह प्रसाद”
 
 
अनुवाद
"अतः हे प्रभु, कृपया मेरे अपराधों को क्षमा करें। मुझे अपना सेवक स्वीकार करके मुझ पर दया करें।"
 
"So, O Lord, please forgive my sins. Accept me as your servant and have mercy on me."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)