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श्लोक 3.5.170  |
স্বপ্নে রাজা মনে চিন্তে—“এ কি-রূপ লীলা!
বুঝিতে না পারি জগন্নাথের কি খেলা!” |
स्वप्ने राजा मने चिन्ते—“ए कि-रूप लीला!
बुझिते ना पारि जगन्नाथेर कि खेला!” |
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| अनुवाद |
| उस स्वप्न में राजा ने सोचा, "यह कैसी लीला है! मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि जगन्नाथ क्या कर रहे हैं!" |
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| In that dream the king thought, "What kind of play is this! I cannot understand what Jagannatha is doing!" |
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