श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 170
 
 
श्लोक  3.5.170 
স্বপ্নে রাজা মনে চিন্তে—“এ কি-রূপ লীলা!
বুঝিতে না পারি জগন্নাথের কি খেলা!”
स्वप्ने राजा मने चिन्ते—“ए कि-रूप लीला!
बुझिते ना पारि जगन्नाथेर कि खेला!”
 
 
अनुवाद
उस स्वप्न में राजा ने सोचा, "यह कैसी लीला है! मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि जगन्नाथ क्या कर रहे हैं!"
 
In that dream the king thought, "What kind of play is this! I cannot understand what Jagannatha is doing!"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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