श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 169
 
 
श्लोक  3.5.169 
দুই শ্রী-নাসায জল পডে নিরন্তর
শ্রী-মুখের লাল পডে, তিতে কলেবর
दुइ श्री-नासाय जल पडे निरन्तर
श्री-मुखेर लाल पडे, तिते कलेवर
 
 
अनुवाद
उनके दोनों नथुनों से निरन्तर जल बहता रहता था और उनका शरीर उनके मुख की लार से भीग जाता था।
 
Water flowed continuously from both his nostrils and his body was drenched with the saliva from his mouth.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)