श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 5: श्री नित्यानंद प्रभु की लीलाएँ  »  श्लोक 154
 
 
श्लोक  3.5.154 
এই মত কত হয অনন্ত বিকার
কত হয কত যায লেখা নাহি তার
एइ मत कत हय अनन्त विकार
कत हय कत याय लेखा नाहि तार
 
 
अनुवाद
इस प्रकार प्रेम के जो असीमित परिवर्तन हुए और लुप्त हुए, उनका वर्णन नहीं किया जा सकता।
 
Thus the infinite changes and disappearances of love cannot be described.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)