श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 4: श्री अच्युतानंद की लीलाओं का वर्णन और श्री माधवेन्द्र का पूजन  »  श्लोक 445
 
 
श्लोक  3.4.445 
নানা দিক্ হৈতে সজ্জ লাগিল আসিতে
হেন নাহি জানি কে আনযে কোন্ ভিতে
नाना दिक् हैते सज्ज लागिल आसिते
हेन नाहि जानि के आनये कोन् भिते
 
 
अनुवाद
सभी दिशाओं से सामग्री आती रही। कोई नहीं जानता था कि उन्हें कौन लाया या कहाँ से लाया।
 
Materials kept coming in from all directions. No one knew who brought them or where they came from.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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