श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 4: श्री अच्युतानंद की लीलाओं का वर्णन और श्री माधवेन्द्र का पूजन  »  श्लोक 437
 
 
श्लोक  3.4.437 
মাধব-পুরীর প্রেম—অকথ্য কথন
মেঘ-দরশনে মূর্চ্ছা হয সেই ক্ষণ
माधव-पुरीर प्रेम—अकथ्य कथन
मेघ-दरशने मूर्च्छा हय सेइ क्षण
 
 
अनुवाद
माधव पुरी का परमानंदपूर्ण प्रेम वर्णन से परे है। बादल देखते ही वे अचेत हो जाते थे।
 
Madhava Puri's ecstatic love is beyond description. He would faint at the sight of clouds.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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