श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 4: श्री अच्युतानंद की लीलाओं का वर्णन और श्री माधवेन्द्र का पूजन  »  श्लोक 401
 
 
श्लोक  3.4.401 
যে-মতে অদ্বৈত শিষ্য হৈলেন তান
চিত্ত দিযাশুন সেই মঙ্গল-আখ্যান
ये-मते अद्वैत शिष्य हैलेन तान
चित्त दियाशुन सेइ मङ्गल-आख्यान
 
 
अनुवाद
अब ध्यानपूर्वक सुनो कि अद्वैत किस प्रकार उनका शिष्य बना।
 
Now listen carefully how Advaita became his disciple.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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