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श्लोक 3.4.394  |
অভেদ-দৃষ্টিতে কৃষ্ণ-বৈষ্ণব ভজি
যাযে কৃষ্ণ-চরণ সেবে, সে যায তরিযা |
अभेद-दृष्टिते कृष्ण-वैष्णव भजि
याये कृष्ण-चरण सेवे, से याय तरिया |
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| अनुवाद |
| जो व्यक्ति कृष्ण के चरणकमलों की सेवा करते हुए कृष्ण तथा वैष्णवों को अभिन्न मानता है, वह भवसागर से मुक्त हो जाता है। |
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| One who serves the lotus feet of Krishna and considers Krishna and the Vaishnavas to be one and the same, becomes free from the ocean of existence. |
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