श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 4: श्री अच्युतानंद की लीलाओं का वर्णन और श्री माधवेन्द्र का पूजन  »  श्लोक 137
 
 
श्लोक  3.4.137 
যে নিমিত্ত অদ্বৈত আবিষ্ট পুত্র-সঙ্গে
সে বড অদ্ভুত কথা, কহি শুন রঙ্গে
ये निमित्त अद्वैत आविष्ट पुत्र-सङ्गे
से बड अद्भुत कथा, कहि शुन रङ्गे
 
 
अनुवाद
अद्वैत को अपने पुत्र की संगति में जो आनंद आया, वह अत्यंत अद्भुत है। उस वृत्तांत को आनंदपूर्वक सुनो।
 
The joy Advaita experienced in the company of his son is truly remarkable. Listen to that story with pleasure.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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