श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 4: श्री अच्युतानंद की लीलाओं का वर्णन और श्री माधवेन्द्र का पूजन  »  श्लोक 104
 
 
श्लोक  3.4.104 
স্বচ্ছন্দে করেন সবাঽ লৈঽ সঙ্কীর্তন
সর্ব-লোক-চূডামণি শ্রী-শচী-নন্দন
स्वच्छन्दे करेन सबाऽ लैऽ सङ्कीर्तन
सर्व-लोक-चूडामणि श्री-शची-नन्दन
 
 
अनुवाद
समस्त जीवों के शिरोमणि श्रीशचीनन्दन अपनी मधुर इच्छा से सबके साथ संकीर्तन करते रहे।
 
Shri Sachinandan, the crown jewel of all living beings, continued to perform Sankirtan with everyone with his sweet will.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)