तं त्वा जगत्-स्थित्युदयान्त हेतुं
समं प्रसन्तं सुहृदात्मदैवं
अनन्य एकं जगदात्मकेतं
भव आपवर्गाय भजाम देवं
“हमें आपकी पूजा करनी चाहिए, जो कि परम भगवान हैं, जिनसे हम भौतिक जीवन से मुक्त हो सकेंगे। आप ब्रह्माण्ड के धारक हैं और इसके निर्माण और विनाश का कारण हैं। संतुलित और पूर्ण रूप से शांतिपूर्ण, आप सच्चे मित्र, आत्मा और पूजनीय प्रभु हैं। आप एक और अद्वितीय हैं, सभी संसारों और सभी आत्माओं का आश्रय हैं।" महाभारत, शांति-पर्व, अध्याय 43, श्लोक 16 और अनुशासन-पर्व, अध्याय 147-148 पर भी विचार करना चाहिए। कठोपनिषद (2.2.8 और 2.3.1) मे कहा गया है: तस्मिन लोकाःश्रिताः सर्वे तदुनात्येति कश्चन—“उसी में सभी संसार स्थित हैं। कोई भी उसे पार नहीं कर सकता।"
