श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान के भुवनेश्वर और अन्य स्थानों से जगन्नाथ पुरी तक के यात्रा का वर्णन,  »  श्लोक 347-348
 
 
श्लोक  3.2.347-348 
ব্রহ্ম-অস্ত্র পাশুপত-অস্ত্র আদি যত
পরম অব্যর্থ মহা-অস্ত্র আর কত
সুদর্শন-স্থানে কারো নাহি প্রতিকার
যার অস্ত্র তারে চাহে করিতে সṁহার
ब्रह्म-अस्त्र पाशुपत-अस्त्र आदि यत
परम अव्यर्थ महा-अस्त्र आर कत
सुदर्शन-स्थाने कारो नाहि प्रतिकार
यार अस्त्र तारे चाहे करिते सꣳहार
 
 
अनुवाद
"ब्रह्मास्त्र और पाशुपतास्त्र जैसे महान अचूक अस्त्र सुदर्शन के सामने शक्तिहीन हैं। जब ऐसे अस्त्र पराजित हो जाते हैं, तो वे अपने धारक को मार डालने की इच्छा रखते हैं।"
 
"Great, infallible weapons like the Brahmastra and the Pashupatastra are powerless before Sudarshan. When such weapons are defeated, they desire to kill their wielder."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)