जब भगवान बलदेव नंद के व्रज पर जा रहे थे, करूषा के राजा पौंड्रक ने मूर्खों से प्रोत्साहित होकर यह घोषणा की कि वह वास्तविक वासुदेव है और भगवान वासुदेव को यह बताया कि खुद उनके अलावा कोई अन्य वासुदेव नहीं है, इसलिए श्रीकृष्ण को वासुदेव का नाम और प्रतीक दोनों त्यागकर पौंड्रक की शरण लेनी चाहिए, अन्यथा उन्हें उनसे युद्ध करना चाहिए। जब उग्रसेन और उनके राजसभा के सदस्यों ने पौंड्रक के मूर्खतापूर्ण घमंड को सुना, तो वे सभी दिल से हँसे। श्रीकृष्ण ने पौंड्रक के दूत को बताया कि वह जल्द ही उस मूर्ख राजा से उसके कृत्रिम प्रतीकों को छुड़वाएंगे, जैसे सुदर्शन चक्र जिसे वह वर्तमान में धारण कर रहा था और युद्ध के मैदान में गिरने के बाद उसका शरीर कुत्तों द्वारा खाया जाएगा। उसके बाद, जब कृष्ण काशी के पास आए, तो पौंड्रक ने उत्साह के साथ अपनी सेना को तुरंत युद्ध के मैदान में अग्रसर किया, और उसका मित्र काशीराज उसका समर्थन करने के लिए उसके पीछे-पीछे चला। जैसे संहार की आग चारों दिशाओं में सब कुछ जला देती है, वैसे ही श्रीकृष्ण ने अपने हथियारों से पौंड्रक और काशीराज की सेनाओं को नष्ट करना शुरू कर दिया। कृष्ण ने तो पौंड्रक को बताया कि वह उन्हें वासुदेव का गलत तरीके से ग्रहण किया गया नाम छोड़ने के लिए मजबूर करेंगे, अन्यथा अगर वह युद्ध नहीं करना चाहते तो वह पौंड्रक के सामने समर्पण कर देंगे। ये शब्द बोलने के बाद, कृष्ण ने पौंड्रक के रथ को एक तीखे तीर से नष्ट कर दिया और अपने सुदर्शन चक्र से पौंड्रक का सिर काट दिया। फिर उन्होंने काशीराज के सिर को उसके शरीर से अलग किया, उसे काशी में फेंक दिया और द्वारका लौट आए। चूंकि पौंड्रक ने श्री हरि की तरह कपड़े पहने थे और हमेशा कृष्ण को याद करते थे, इसलिए उन्होंने मुक्ति प्राप्त की।
जब काशीराज की रानी, बच्चों और रिश्तेदारों ने उसका कटा हुआ सिर देखा, तो वे रोने लगे। उसके बाद, अपने पिता के हत्यारे से बदला लेने की इच्छा के साथ, काशीराज के पुत्र सुदक्षिणा ने महादेव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्याएं शुरू कीं। जब महादेव उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान देने की इच्छा हुई, तो सुदक्षिणा ने अपने पिता के हत्यारे को मारने के साधन का अनुरोध किया। महादेव ने उन्हें अभिचार अनुष्ठान के आदेशों के अनुसार दक्षिणाग्नि अग्नि की पूजा करने का निर्देश दिया। यज्ञ पूरा होने के बाद, यज्ञ की अग्नि कुंड से एक हाथ में ज्वलंत त्रिशूल के साथ एक भयानक ज्वलंत रूप प्रकट हुआ। जब उस राक्षस को द्वारका भेजा गया, तो द्वारका के निवासी भयभीत हो गए और कृष्ण के पास पहुंचे, जो शतरंज खेलने में लगे हुए थे। श्रीकृष्ण ने उन्हें आश्वासन दिया और महादेव की मदद से बनाए गए राक्षस को नष्ट करने के लिए सुदर्शन चक्र को आदेश दिया। जब सुदर्शन चक्र के प्रभाव से अभिचार अनुष्ठान द्वारा बनाई गई आग को रोक दिया गया, तो वह वापस वाराणसी लौट गई और पुजारियों और सुदक्षिणा को राख कर दिया। फिर सुदर्शन चक्र ने वाराणसी में प्रवेश किया, पूरे शहर को जला दिया और कृष्ण के पास लौट आया।
