श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान के भुवनेश्वर और अन्य स्थानों से जगन्नाथ पुरी तक के यात्रा का वर्णन,  »  श्लोक 177
 
 
श्लोक  3.2.177 
দানী বলে,—“এ পুরুষ নর কভু নহে
মনুষ্যের নযনে কি এত ধারা বহে”
दानी बले,—“ए पुरुष नर कभु नहे
मनुष्येर नयने कि एत धारा वहे”
 
 
अनुवाद
टोल कलेक्टर ने सोचा, "यह व्यक्ति कोई साधारण इंसान तो नहीं है। क्या कोई इंसान ऐसे आँसू बहा सकता है?"
 
The toll collector thought, "This man is no ordinary human being. Can any human being shed such tears?"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)