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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 3: अंत्य-खण्ड
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अध्याय 2: भगवान के भुवनेश्वर और अन्य स्थानों से जगन्नाथ पुरी तक के यात्रा का वर्णन,
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श्लोक 156
श्लोक
3.2.156
আঙ্চল পাতেন প্রভু শ্রী-গৌরসুন্দর
সবেই তণ্ডুল আনিঽ দেযেন সত্বর
आङ्चल पातेन प्रभु श्री-गौरसुन्दर
सबेइ तण्डुल आनिऽ देयेन सत्वर
अनुवाद
जैसे ही श्री गौरसुन्दर ने भिक्षा के लिए अपना वस्त्र आगे बढ़ाया, सभी ने तुरन्त उसमें चावल डाल दिए।
As soon as Sri Gaurasundara extended his cloth for alms, everyone immediately put rice in it.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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