श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान के भुवनेश्वर और अन्य स्थानों से जगन्नाथ पुरी तक के यात्रा का वर्णन,  »  श्लोक 135-136
 
 
श्लोक  3.2.135-136 
কূলেতে উঠিলে বাঘে লৈযা পলায
জলেতে পডিলে কুম্ভীরেতে ধরিঽ খায
নিরন্তর এ পানীতে ডাকাইত ফিরে
পাইলেই ধন-প্রাণ দুই নাশ করে
कूलेते उठिले वाघे लैया पलाय
जलेते पडिले कुम्भीरेते धरिऽ खाय
निरन्तर ए पानीते डाकाइत फिरे
पाइलेइ धन-प्राण दुइ नाश करे
 
 
अनुवाद
"अगर हम किनारे पहुँच गए, तो बाघ हम पर हमला कर देंगे, और अगर हम पानी में गिर गए, तो मगरमच्छ हमें खा जाएँगे। इस पानी में बदमाश लगातार घूमते रहते हैं। अगर वे किसी को पकड़ लेते हैं, तो उसकी जान और माल दोनों छीन लेते हैं।"
 
"If we reach the shore, tigers will attack us, and if we fall into the water, crocodiles will eat us. There are always scoundrels roaming in these waters. If they catch someone, they take away both his life and property."
तात्पर्य
जब श्री गौरसुंदर रामचंद्र खान की नाव पर सवार हुए तो मुकुंद कृष्ण के गौरव का गुणगान करने लगे। उस समय मूर्ख नाविक चिंतित हो गया क्योंकि उसे अपने आसन्न विनाश की चिंता होने लगी। अगर कोई सुंदरबन के अगम्य जंगलों से होकर यात्रा करता है, तो उसे आम तौर पर जमीन पर बाघ और पानी में मगरमच्छ दिखाई देते हैं। इसके अलावा, उस जलमार्ग में कई समुद्री लुटेरे लूटपाट और हत्या करते थे। यही कारण है कि नाविक ने सभी को कीर्तन रोकने के लिए कहा। नाविक की चिंता का एक और कारण यह था कि अगर वह रामचंद्र खान के आदेश का पालन नहीं करता, यानी अगर वह महाप्रभु को उड़ीसा नहीं ले जाता, तो रामचंद्र खान उसे मार डालेगा। इसके अलावा, उड़ीसा जाते समय रास्ते में दुश्मन के खेमे के दिखने की पूरी संभावना थी। अगर उन्होंने नाव चलाते समय कीर्तन किया, तो दुश्मन के सैनिक कीर्तन की आवाज़ का पीछा करेंगे और हमला करेंगे। इसलिए नाव में खतरा था, ज़मीन पर खतरा था और डूबने का खतरा भी था। रामचंद्र खान का खतरा था, दुश्मन राजा का खतरा था और रामचंद्र खान के अधीनस्थों से खतरा था। अगर समुद्री लुटेरों या दुश्मन के खेमे ने कीर्तन की तेज आवाज़ सुनी, तो वे हमला कर देंगे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)