श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान के भुवनेश्वर और अन्य स्थानों से जगन्नाथ पुरी तक के यात्रा का वर्णन,  »  श्लोक 121
 
 
श्लोक  3.2.121 
আবিষ্ট হৈলা প্রভু করিঽ আচমন
“কত দূর জগন্নাথ?” বলে ঘনে ঘন
आविष्ट हैला प्रभु करिऽ आचमन
“कत दूर जगन्नाथ?” बले घने घन
 
 
अनुवाद
भगवान् हाथ-मुँह धोते समय अभिभूत हो गए और बार-बार पूछने लगे, "जगन्नाथ पुरी कितनी दूर है?"
 
While washing his hands and face, the Lord became overwhelmed and repeatedly asked, "How far is Jagannatha Puri?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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