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श्लोक 3.2.108  |
ভিক্ষা করে প্রভু প্রিয-বর্গ-সন্তোষার্থ
নিরবধি প্রভুর ভোজন—পরমার্থ |
भिक्षा करे प्रभु प्रिय-वर्ग-सन्तोषार्थ
निरवधि प्रभुर भोजन—परमार्थ |
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| अनुवाद |
| भगवान केवल अपने प्रिय भक्तों की संतुष्टि के लिए ही भोजन करते थे। भगवान का भोजन सदैव आध्यात्मिक खाद्य-पदार्थों से ही युक्त होता था। |
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| The Lord ate only to satisfy His beloved devotees. His meals always consisted of spiritual foods. |
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