श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान के भुवनेश्वर और अन्य स्थानों से जगन्नाथ पुरी तक के यात्रा का वर्णन,  »  श्लोक 108
 
 
श्लोक  3.2.108 
ভিক্ষা করে প্রভু প্রিয-বর্গ-সন্তোষার্থ
নিরবধি প্রভুর ভোজন—পরমার্থ
भिक्षा करे प्रभु प्रिय-वर्ग-सन्तोषार्थ
निरवधि प्रभुर भोजन—परमार्थ
 
 
अनुवाद
भगवान केवल अपने प्रिय भक्तों की संतुष्टि के लिए ही भोजन करते थे। भगवान का भोजन सदैव आध्यात्मिक खाद्य-पदार्थों से ही युक्त होता था।
 
The Lord ate only to satisfy His beloved devotees. His meals always consisted of spiritual foods.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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