श्रीमद् भागवतम् (11.6.46) में कहा गया है :
त्वयोपभुक्त-स्रग्-गन्ध-
वासोऽलङ्कार-चर्चिताः
उच्छिष्ट-भोजिनो दासा
तव मायां जयेम हि
"आपके द्वारा धारण की गयी मालाएँ, सुगंधित तेल, वस्त्र एवं आभूषणों के अवशिष्ट अंश से अपने आपको सजाने और आपके भोजन के अवशिष्ट अंशों का उपभोग करके ही, हम आपके सेवक आपकी माया को जीत लेंगे।"
चैतन्य-चरितामृत (मध्य 15.236) में कहा गया है :
प्रभु कहें,- भाल कैले, शास्त्र-आज्ञा हय
कृष्णेर सकल शेष भृत्य आस्वादय
"चैतन्य महाप्रभु ने कहा, 'हाँ, आपने बिल्कुल सही कहा। शास्त्र आज्ञा देते हैं कि भक्त कृष्ण के सभी अवशिष्ट अंशों का आस्वादन कर सकता है।'"
