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श्लोक 3.1.16  |
বাহ্য দূরে গেল ভারতীর প্রেম-রসে
গডাগডি যায বস্ত্র না সম্বরে শেষে |
बाह्य दूरे गेल भारतीर प्रेम-रसे
गडागडि याय वस्त्र ना सम्वरे शेषे |
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| अनुवाद |
| प्रेमोन्मत्त होकर केशव भारती अपनी बाह्य चेतना खो बैठे। वे भूमि पर लोटने लगे और उनके वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गए। |
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| In a fit of love, Keshav Bharati lost his consciousness, rolling on the ground and his clothes becoming disheveled. |
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