श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 1: श्री अद्वैत आचार्य के घर में फिर मिलना  »  श्लोक 135
 
 
श्लोक  3.1.135 
মত্ত-সিṁহ-প্রায প্রভু আনন্দে বিহ্বল
বিধি-নিষেধের পার বিহার সকল
मत्त-सिꣳह-प्राय प्रभु आनन्दे विह्वल
विधि-निषेधेर पार विहार सकल
 
 
अनुवाद
भगवान नित्यानंद मदमस्त सिंह की भाँति आनंद में डूबे हुए थे। उनकी लीलाएँ समस्त विधि-विधानों से परे हैं।
 
Lord Nityananda was immersed in bliss like a lion in a state of intoxication. His pastimes transcend all rules and regulations.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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