श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 9: भगवान का इक्कीस घंटे का भावोन्माद और श्रीधर और अन्य भक्तों के लक्षणों का वर्णन  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  2.9.95 
দেবানন্দ ইথে না করিল নিবারণ
গুরু যথা অজ্ঞ, সেই-মত শিষ্য-গণ
देवानन्द इथे ना करिल निवारण
गुरु यथा अज्ञ, सेइ-मत शिष्य-गण
 
 
अनुवाद
देवानंद ने उन्हें नहीं रोका। चूँकि गुरु अज्ञानी थे, इसलिए उनके शिष्य भी अज्ञानी थे।
 
Devananda did not stop him. Since the guru was ignorant, his disciples were also ignorant.
तात्पर्य
देवानंद के छात्रगण, जो उनके संरक्षण में थे, वे श्रीवास की भक्ति सेवा के फल को समझ नहीं पाए। वे भौतिक ग्रहण में नियंत्रित थे, और इसलिए, श्रीवास के चरणों पर अपराध किए। क्योंकि अध्यापक, देवानंद ने, अपने अज्ञानी छात्रों के कार्यों को रोकने का प्रयास नहीं किया, वह भी अपराध के दोषी हुए। देवानंद, जो भक्ति सेवा से अंजान थे, ने अपने छात्रों को अपने शिक्षण में भक्ति सेवा के उच्च स्थान के बारे में जानकारी नहीं दी। इसलिए, चूंकि गुरु को भक्ति सेवा में कोई योग्यता नहीं थी, इसलिए उनके शिष्य भी भक्ति सेवा से रहित थे।

भक्तिपूर्ण शुद्ध भक्तों के उपदेश देने के दयालु तरीके को देखकर, आजकल कई लोग कहते हैं कि घर में अकेले में प्रभु की पूजा करना बेहतर होता है। उनका कहना है कि घमंड और अहंकार जैसी विभिन्न बाधाएं उन लोगों पर हमला करती हैं जो कीर्तन के माध्यम से उपदेश देते हैं। परंतु इस उदाहरण में, यदि देवानंद पंडित जैसा कोई व्यक्ति भक्ति सेवा के बारे में अज्ञानी रहता है और भक्ति सेवा की महिमा का प्रचार नहीं करता है, तो वह अपराध करता है। यही इस लीला का उद्देश्य है। इस दुनिया की हर गतिविधि में भक्ति सेवा की कमी देखी जाती है, परंतु यदि कोई उस कमी को दूर करने के लिए प्रभु का गौरव नहीं करता है, तो वह अपराध से छुआ हुआ होता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)