श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 9: भगवान का इक्कीस घंटे का भावोन्माद और श्रीधर और अन्य भक्तों के लक्षणों का वर्णन  »  श्लोक 242
 
 
श्लोक  2.9.242 
ভাগবত পডিযা ও কাঽরো বুদ্ধি-নাশ
নিত্যানন্দ-নিন্দা করে যাইবেক নাশ
भागवत पडिया ओ काऽरो बुद्धि-नाश
नित्यानन्द-निन्दा करे याइबेक नाश
 
 
अनुवाद
श्रीमद्भागवत का अध्ययन करने के बाद भी मनुष्य की बुद्धि नष्ट हो सकती है, क्योंकि जो कोई नित्यानंद की निन्दा करता है, वह निश्चित रूप से पराजित होता है।
 
Even after studying the Srimad Bhagavatam, one's intellect can be destroyed, because anyone who slanders Nityananda is certainly defeated.
तात्पर्य
श्री ब्रह्म-माधव-गौडीय वैष्णवों के मार्गदर्शन में श्रीमद् भागवतम् पर चर्चा करने के बजाय, अपने ज्ञान, धन, सौंदर्य, प्रसिद्धि और उत्तम जन्म के आधार पर अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने की इच्छा रखने वाले बहुत से लोग श्रीमद् भागवतम् पर पागल लोगों के साथ चर्चा करते हैं और भक्ति-सेवा के प्रति वैमनस्य रखते हैं। श्री नित्यानंद स्वरूप के आश्रय से रहित ऐसे व्यक्ति भगवान चैतन्य की सेवा खो देते हैं और वैष्णव गुरु का अनादर करते हैं। परिणामस्वरूप, उनकी भक्ति की कमी उजागर हो जाती है और वे गर्व से वैष्णवों के उपदेशक बनने का दिखावा करते हैं। क्योंकि उनकी दृष्टि नहीं है कि परमेश्वर सभी जीवों के भीतर स्थित हैं, वे पूरे संसार को दुखों से भरा हुआ देखते हैं। अपने अभिमान को पोषित करने के लिए, वे कई गैर-भक्ति गतिविधियों को ईर्ष्या से अपना लेते हैं जैसे कि खुद को भक्तों का उपदेशक मानना और दीक्षा गुरुओं के रूप में दीक्षा देने का दिखावा करना। लेकिन यदि वे किसी वैष्णव गुरु के अधीन श्रीमद् भागवतम् का अध्ययन करते हैं, तो स्वाभाविक विनम्रता से वे स्वयं को गली के पुआल से भी नीचे समझेंगे और वे श्रीमद् भागवतम् का अध्ययन और शिक्षा देने के योग्य बन जाएँगे। ऐसे जीव जिन्हें श्री चैतन्य की दया की एक छोटी सी झलक भी मिली है, वे पूरे संसार को शाश्वत सुख से भरा हुआ देखते हैं। भौतिक ज्ञान के विशेषज्ञों के लिए श्रीमद् भागवतम् को पढ़ाना असंभव है जब तक कि वे वैष्णवों के शाश्वत सेवक न हों। भौतिक ज्ञान के आश्रय वाले लोग श्रीमद् भागवतम् के शिक्षक होने का अभिमान करते हैं। भागवतों के सेवक बनने के बजाय, वे अपने पेट भरने के लिए खुद को भागवतों का स्वामी मानते हैं। अपने व्यवसाय को "धर्म" मानते हुए, वे नित्यानंद के पदचिन्हों पर चलने के रूप में विभिन्न गैर-भक्ति गतिविधियों को स्वीकार करते हैं, लेकिन हर दृष्टि से यह नित्यानंद की निंदा है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)