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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 2: मध्य-खण्ड
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अध्याय 8: भगवान की आभूषण का प्रकटन
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श्लोक 276
श्लोक
2.8.276
“জয কৃষ্ণ মুরারি মুকুন্দ বনমালী”
অহর্-নিশ গায সবে হৈঽ কুতূহলী
“जय कृष्ण मुरारि मुकुन्द वनमाली”
अहर्-निश गाय सबे हैऽ कुतूहली
अनुवाद
दिन-रात वे खुशी से जपते रहते थे, “जय कृष्ण, मुरारी, मुकुंद, वनमाली!”
Day and night he would happily chant, “Jai Krishna, Murari, Mukunda, Vanmali!”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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