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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 2: मध्य-खण्ड
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अध्याय 8: भगवान की आभूषण का प्रकटन
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श्लोक 218
श्लोक
2.8.218
নাচে প্রভু গৌরচন্দ্র জগত্-জীবন
আবেশের অন্ত নাহি হয ঘনে ঘন
नाचे प्रभु गौरचन्द्र जगत्-जीवन
आवेशेर अन्त नाहि हय घने घन
अनुवाद
इस प्रकार, समस्त ब्रह्माण्ड के प्राण श्री गौरसुन्दर नृत्य करते रहे। उन्होंने बार-बार अनेक प्रकार की मनोभावनाएँ व्यक्त कीं।
In this way, Sri Gauranga, the soul of the entire universe, continued to dance. He repeatedly expressed a variety of emotions.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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