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श्लोक 2.8.215  |
শুনিতে শুনিতে ক্ষণে হয মূরছিত
তৃণ-করে তখনে অদ্বৈত উপনীত |
शुनिते शुनिते क्षणे हय मूरछित
तृण-करे तखने अद्वैत उपनीत |
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| अनुवाद |
| कीर्तन सुनते-सुनते अद्वैत आचार्य कभी-कभी बेहोश हो जाते थे। वे हाथ में तिनका लेकर भगवान के पास जाते थे। |
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| Advaita Acharya would sometimes faint while listening to the kirtan. He would approach the Lord with a straw in his hand. |
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