श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 8: भगवान की आभूषण का प्रकटन  »  श्लोक 213
 
 
श्लोक  2.8.213 
চৈতন্যের বাক্যে যার নাহিক প্রমাণ
চৈতন্য নাহিক তাঽর, কি বলিব আন
चैतन्येर वाक्ये यार नाहिक प्रमाण
चैतन्य नाहिक ताऽर, कि बलिब आन
 
 
अनुवाद
जो कोई भगवान चैतन्य के वचनों पर विश्वास नहीं करता, वह उन्हें प्राप्त नहीं कर सकता। मैं इससे ज़्यादा क्या कहूँ?
 
Anyone who does not believe in the words of Lord Caitanya cannot attain Him. What more can I say?
तात्पर्य
श्री चैतन्यदेव के वचन सभी निष्कर्षों का शिरोमणि है। केवल भक्ति सेवा ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। जिसके पास यह विश्वास नहीं है वह भगवान चैतन्य से दूर है और उसे मूर्ख कहा जाना चाहिए। वैदिक साहित्य और श्रीमद् भागवतम, जो कि वेदों का सार है, भक्ति सेवा की श्रेष्ठता को पूर्ण रूप से स्थापित करते हैं। नारायण की देवी भाग्य, साथ ही भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव, सभी सर्वोच्च भगवान के सेवक हैं। श्रील चक्रवर्ती ठाकुर ने लिखा है:

आराध्यो भगवान् व्रजेश-तनयस् तद्-धाम वृन्दावनम्

रम्या काचित् उपासना व्रज-वधू-वर्गेण या कल्पिता

श्रीमद्-भागवतं प्रमाणममलं प्रेमा पुम्-अर्थो महान्

श्री-चैतन्य-महाप्रभोर मतमिदं तत्रादराः नः परः

"ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व को, नंद महाराज के पुत्र के रूप में, उनके पारलौकिक निवास, वृंदावन के साथ पूजा जाना चाहिए। भगवान के लिए पूजा का सबसे सुखद रूप वह है जो वृंदावन की गोपियों द्वारा किया गया था। श्रीमद् भागवतम निर्दोष अधिकार है, और ईश्वर के लिए शुद्ध प्रेम जीवन का अंतिम लक्ष्य है। ये कथन, जिनके लिए हमारे पास सर्वोच्च सम्मान है, श्री चैतन्य महाप्रभु की राय है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)