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श्लोक 2.8.205  |
কতি গেল রমার বদন-দৃষ্টি-সুখ
বিরহী হৈযা কান্দে তুলিঽ বাহু-মুখ |
कति गेल रमार वदन-दृष्टि-सुख
विरही हैया कान्दे तुलिऽ बाहु-मुख |
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| अनुवाद |
| कहाँ गई वह प्रसन्नता जो लक्ष्मीजी राम के मुख को देखने से हुई थी? अब भगवान् ने अपनी भुजाएँ और मुख ऊपर उठाकर विरह में रोना आरम्भ कर दिया। |
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| Where did the joy that Lakshmiji had felt upon seeing Rama's face go? Now the Lord raised his arms and face and began to weep in separation. |
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