श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 8: भगवान की आभूषण का प्रकटन  »  श्लोक 138
 
 
श्लोक  2.8.138 
শ্রী-হরি-বাসরে হরি-কীর্তন-বিধান
নৃত্য আরম্ভিলা প্রভু জগতের প্রাণ
श्री-हरि-वासरे हरि-कीर्तन-विधान
नृत्य आरम्भिला प्रभु जगतेर प्राण
 
 
अनुवाद
श्री हरि-वासर के दिन, जो हरि के नामों का कीर्तन करके मनाया जाता है, भगवान, जो सम्पूर्ण जगत के प्राण हैं, नृत्य करने लगे।
 
On the day of Sri Hari-vasara, which is celebrated by chanting the names of Hari, the Lord, who is the life of the entire universe, began to dance.
तात्पर्य
श्री हरि-वसारा के उपवास के दिन, भगवान गौरासुंदर ने नृत्य करना शुरू कर दिया और हरि के नामों का जाप किया।

श्री हरि-वसारा वाक्यांश का अर्थ है "भगवान हरि का दिन"; दूसरे शब्दों में, एकादशी, द्वादशी, या भगवान के प्रकट होने का दिन।

हरि-भक्ति-विलास में कहा गया है कि जो कोई भी श्री हरि-वसारा के दिन उपवास करता है, भगवान हरि को भक्ति के साथ याद करता है, हरि के नामों का जाप करता है, हरि के आनंद के लिए कार्य करता है, अपना मन हरि पर स्थिर रखता है और भौतिक सुखों के प्रति सभी इच्छाओं को त्याग देता है, तो वह निस्संदेह प्रह्लाद की तरह हरि के धाम को प्राप्त कर सकता है। भगवान हरि के भक्तों का कर्तव्य है कि वे चंदन का लेप, फूल, अगरबत्ती, दीपक, उत्तम भोजन, विभिन्न उपहार देकर और जप, अग्नि यज्ञ, परिक्रमा, विभिन्न प्रार्थनाएँ, आनंददायक नृत्य और भजन, वाद्य यंत्र बजाना, नमस्कार करना, "जय!" "और रात में जागते हुए भगवान हरि की महिमा का जाप करते हुए भगवान की महिमा का गुणगान करें।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)