गदाधर जानते थे कि साधारण मूर्ख लोग रूप, स्वाद, गंध, ध्वनि और स्पर्श का आनंद लेने में कैसे लीन रहते हैं; इसलिए वे यह देखकर आश्चर्यचकित हो गए कि कैसे विद्यानidhi महाशय अपने आस-पास रहते हुए उन वस्तुओं से पूरी तरह से अलग थे और कैसे वह हमेशा अपनी आंतरिक प्रवृत्ति के बल पर कृष्ण की सेवा के लिए उत्सुक रहते थे। और गदाधर ने ऐसे महा-भागवत को एक साधारण भौतिकवादी के बराबर माना, तो वह चिंतित हो गए, यह सोचकर कि उन्होंने वैष्णव-अपराध किया था।
