श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 7: गदाधर और पुण्डरीक का मिलन  »  श्लोक 94-95
 
 
श्लोक  2.7.94-95 
দেখি’ গদাধর মহা হৈলা বিস্মিত
তখন সে মনে বড হৈলা চিন্তিত
“হেন মহাশযে আমি অবজ্ঞা করিলুঙ্কোন্
বা অশুভ-ক্ষণে দেখিতে আইলুঙ্
देखि’ गदाधर महा हैला विस्मित
तखन से मने बड हैला चिन्तित
“हेन महाशये आमि अवज्ञा करिलुङ्कोन्
वा अशुभ-क्षणे देखिते आइलुङ्
 
 
अनुवाद
यह देखकर गदाधर को आश्चर्य हुआ और वे कुछ चिंतित भी हुए। "मैंने ऐसे महान् पुरुष का अनादर किया है। किस अशुभ घड़ी में मैं उनके दर्शन करने आया हूँ?"
 
Seeing this, Gadadhara was surprised and a little worried. "I have disrespected such a great man. What inauspicious time have I come to see him?"
तात्पर्य
विद्यानidhi महाशय के ऐश्वर्यपूर्ण साधनों और उनसे भोग करने वाले उनके कौशल को देखते हुए, गदाधर पंडित ने निष्कर्ष निकाला कि वे भगवान की भक्ति से रहित थे; लेकिन विद्यानidhi ने उन वस्तुओं के प्रति उदासीनता का प्रदर्शन किया और मुकुंद के पाटान पर कृष्ण की दया के वर्णन को सुनकर उनके प्रेम में उत्साहपूर्ण परिवर्तन गदाधर के हृदय में विस्मय उत्पन्न हुआ।

गदाधर जानते थे कि साधारण मूर्ख लोग रूप, स्वाद, गंध, ध्वनि और स्पर्श का आनंद लेने में कैसे लीन रहते हैं; इसलिए वे यह देखकर आश्चर्यचकित हो गए कि कैसे विद्यानidhi महाशय अपने आस-पास रहते हुए उन वस्तुओं से पूरी तरह से अलग थे और कैसे वह हमेशा अपनी आंतरिक प्रवृत्ति के बल पर कृष्ण की सेवा के लिए उत्सुक रहते थे। और गदाधर ने ऐसे महा-भागवत को एक साधारण भौतिकवादी के बराबर माना, तो वह चिंतित हो गए, यह सोचकर कि उन्होंने वैष्णव-अपराध किया था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)