श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 6: अद्वैत आचार्य से भगवान की मिलन  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  2.6.57 
গুপ্তে থাকোঙ্ মুঞি নন্দন-আচার্যের ঘরে
’না আইলা বলি’ তুমি করিবা গোচরে”
गुप्ते थाकोङ् मुञि नन्दन-आचार्येर घरे
’ना आइला बलि’ तुमि करिबा गोचरे”
 
 
अनुवाद
“मैं गुप्त रूप से नन्दन आचार्य के घर में रहूँगा, किन्तु आप उनसे कह देना कि, ‘वे नहीं आये हैं।’”
 
“I will stay secretly at Nandan Acharya's house, but you tell him, 'He has not come.'”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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