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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 2: मध्य-खण्ड
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अध्याय 6: अद्वैत आचार्य से भगवान की मिलन
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श्लोक 118
श्लोक
2.6.118
জয জয মহাপ্রভু অনন্ত-শযন
জয জয জয সর্ব-জীবের শরণ
जय जय महाप्रभु अनन्त-शयन
जय जय जय सर्व-जीवेर शरण
अनुवाद
अनंत शय्या पर लेटे हुए महाप्रभु की जय हो! समस्त जीवों के आश्रय की जय हो!
Glory to the Supreme Lord, who lies on the eternal bed! Glory to the refuge of all beings!
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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