श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 6: अद्वैत आचार्य से भगवान की मिलन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.6.1 
জযতি জযতি দেবঃ কৃষ্ণ-চৈতন্য-চন্দ্রো
জযতি জযতি কীর্তিস্ তস্য নিত্যা পবিত্রা
জযতি জযতি ভৃত্যাস্ তস্য বিশ্বেশ-মূর্তের্
জযতি জযতি ভৃত্যস্ তস্য সর্ব-প্রিযাণাম্
जयति जयति देवः कृष्ण-चैतन्य-चन्द्रो
जयति जयति कीर्तिस् तस्य नित्या पवित्रा
जयति जयति भृत्यास् तस्य विश्वेश-मूर्तेर्
जयति जयति भृत्यस् तस्य सर्व-प्रियाणाम्
 
 
अनुवाद
श्री कृष्ण चैतन्यचंद्र की जय हो, जो पूर्णतः स्वतंत्र भगवान् और दिव्य लीलाओं के धाम हैं! उनके नित्य शुद्ध कर्मों की जय हो! श्री गौरसुन्दर सभी नियन्ताओं के नियन्ता, ब्रह्माण्ड के स्वामी और दिव्य ज्ञान के साकार स्वरूप हैं। उनके भक्तों की जय हो, और उनके प्रिय पार्षदों के नृत्य की जय हो!
 
All hail Sri Krishna Chaitanyachandra, the completely independent Lord and the abode of transcendental pastimes! All hail His eternally pure actions! All hail Sri Gauranga, the controller of all controllers, the Lord of the universe, and the embodiment of transcendental wisdom. All hail His devotees, and all hail the dance of His beloved associates!
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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