श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.5.31 
যে ধরযে ত্রিভুবন, কে ধরিব তারে
মহা-মত্ত দুই প্রভু কীর্তনে বিহরে
ये धरये त्रिभुवन, के धरिब तारे
महा-मत्त दुइ प्रभु कीर्तने विहरे
 
 
अनुवाद
जो तीनों लोकों को धारण करता है, उसे कौन धारण कर सकता है? इस प्रकार दोनों भगवान् कीर्तन के आनंद में मग्न हो गए।
 
Who can hold Him who holds the three worlds? Thus both the Lords became immersed in the bliss of chanting.
तात्पर्य
श्री गौर और श्री नित्यानंद दोनों ही समस्त लोकों के पालनकर्ता हैं। इसलिए इस लोक के सृजित मानव भला समस्त लोकों के पालनकर्ताओं का पालन कैसे करेंगे?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)