श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.5.25 
হুঙ্কার করযে কেহ, কেহ বা গর্জন
কেহ মূর্ছা যায, কেহ করযে ক্রন্দন
हुङ्कार करये केह, केह वा गर्जन
केह मूर्छा याय, केह करये क्रन्दन
 
 
अनुवाद
कोई ज़ोर से दहाड़ा, कोई चीखा, कोई बेहोश हो गया, तो कोई रो पड़ा।
 
Some roared loudly, some screamed, some fainted, and some started crying.
तात्पर्य
जब किसी सशर्त आत्मा के हृदय में आध्यात्मिक चेतना जागृत होती है, तो उसके शरीर में अत्यधिक प्रेम के लक्षण प्रकट होते हैं। फिर वह सांसारिक धारणाओं को खो देता है और इस दुनिया में विभिन्न आध्यात्मिक आनंद के लक्षण प्रदर्शित करता है। इस आदर्श को प्रदर्शित करने के लिए, श्री गौरासुंदर, जो चौदहों लोकों के स्वामी हैं और जो भौतिक प्रकृति के अधिकार क्षेत्र से परे हैं, अपने सहयोगियों की संगति में अत्यधिक प्रेम के साथ नृत्य करते हैं। व्रजेंद्र-नंदन द्वारा इस दुनिया में व्यक्तिगत रूप से प्रकट किए जाने वाले पारलौकिक लीलाओं पर भौतिक कंडीशनिंग की स्थिति का श्रेय देना पूरी तरह से अनुचित है ताकि सशर्त आत्माओं के अज्ञानता के अंधेरे को दूर किया जा सके। जब सशर्त आत्माएं साधना के मार्ग पर स्थित होती हैं, तो वे प्रभु की लीलाओं की महिमापूर्ण पारलौकिक प्रकृति को समझ नहीं पाती हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)