श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 150
 
 
श्लोक  2.5.150 
প্রসঙ্গে কহিল ভক্তাধমের লক্ষণে
পূর্ণ হৈলা নিত্যানন্দ ষড্-ভুজ-দরশনে
प्रसङ्गे कहिल भक्ताधमेर लक्षणे
पूर्ण हैला नित्यानन्द षड्-भुज-दरशने
 
 
अनुवाद
इन कथाओं में मैंने अधम भक्तों के लक्षणों का वर्णन किया है। इस प्रकार भगवान के छः भुजाओं वाले रूप को देखकर नित्यानन्द आनंद से भर गए।
 
In these stories I have described the characteristics of the lowest devotees. Thus seeing the six-armed form of the Lord, Nityananda was filled with joy.
तात्पर्य
निम्नतम भक्त का लक्षण भगवान की पूजा के बहाने भक्तों की पूजा छोड़ देना है। इस तरह की हरकतों के कारण, यह संभव है कि ऐसे भक्त भगवान विष्णु की सेवा से विमुख हो जाएँ। जो लोग परमेश्वर और उनके संगियों की उपासना करते हैं और जो मानते हैं कि भक्तों की उपासना भगवान की उपासना से अधिक महत्वपूर्ण है, वास्तव में उन्नत भक्त हैं। उनके पतन की संभावना बहुत कम होती है, क्योंकि वे जानते हैं:

यस्य देवे परा भक्ति यथा देवे तथा गुरौ

तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः

‘‘केवल उन्हीं महान आत्माओं के लिए, जिनकी भगवान और आध्यात्मिक गुरु दोनों में ही अगाध श्रद्धा है, वैदिक ज्ञान के सभी अर्थ स्वतः ही प्रकट हो जाते हैं।’’ (श्वेताश्वतर उपनिषद् 6.23)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)