"अर्चायाम एव हरये पूजां यः श्रद्धये हत, न तद्-भक्तेषु चान्येषु, स भक्तः प्राकृतः स्मृतः |"
"एक भक्त जो मंदिर में देवता की पूजा में निष्ठापूर्वक संलग्न है लेकिन अन्य भक्तों या सामान्य लोगों के प्रति उचित व्यवहार नहीं करता है उसे प्राकृत-भक्त, एक भौतिकवादी भक्त कहा जाता है, और उसे निम्नतम स्थिति में माना जाता है।" वैष्णवों के दो प्रकार हैं- साधारण या अनधिकृत वैष्णव और शुद्ध या अधिकृत वैष्णव। विष्णुस्वामी-सम्प्रदाय रुद्रदेव से उत्पन्न हुआ, श्री माधव-सम्प्रदाय ब्रह्मा से उत्पन्न हुआ, रामानुज-सम्प्रदाय श्री लक्ष्मीदेवी से उत्पन्न हुआ, और निम्बार्क-सम्प्रदाय चार कुमारों से उत्पन्न हुआ। यदि कोई एक का सम्मान करता है और उनके आपसी मतभेदों को ध्यान में रखते हुए दूसरे की निंदा करता है, तो वह निश्चित रूप से कनिष्ठ-अधिकार के स्तर से गिर जाता है। सभी देवता और देवियाँ अपना समय प्रभु की सेवा करने की अपनी जिम्मेदारी को पूरा करने में बिताते हैं, और उनके सौंपे गए पद इस दुनिया को ज्ञात हैं। फिर भी वैष्णवों के रूप में उनकी संवैधानिक स्थिति नहीं खोई है। यदि कोई भौतिक अवधारणाओं में से देवताओं और देवियों का अनादर करता है, तो उसके पास विष्णु के प्रति भक्ति नहीं हो सकती। यदि कोई आध्यात्मिक गुरुओं या देवताओं और देवियों को विष्णु की भक्ति से रहित स्वीकार करता है, तो वह अपराध करता है। लेकिन देवताओं और देवियों के सौंपे गए पदों की पूजा करके और कृष्ण की सेवा को भूलकर, कोई भी लाभ नहीं प्राप्त कर सकता है। इसीलिए ठाकुर नरसिंह ने कहा है: हृषीके गोविंद-सेवा, ना पूजिबा देवी-देवा, एइ ता' अनन्या-भक्ति-कथा- "मैं अपने इन्द्रियों को गोविंद की सेवा में लगाऊंगा, और मैं देवताओं की पूजा नहीं करूंगा। यह अटूट भक्ति सेवा का वर्णन है। " प्रभु की सेवा में अटूट हो जाने से देवताओं की निंदा नहीं होती है। सभी देवता और देवियाँ भगवान के आश्रय में हैं, इसलिए केवल भगवान की सेवा करके देवताओं की पूजा अपने आप हो जाती है। यदि कोई किसी विशेष देवता या देवी की पूजा करता है, तो अन्य देवता और देवियाँ अप्रसन्न हो जाते हैं। लेकिन यदि कोई भगवान की पूजा करता है, तो सभी देवता, जो भगवान के अधीन हैं, स्वतः ही पूजे जाते हैं। वैष्णव की निंदा एक सामान्य जीव की निंदा से सैंकड़ों गुना अधिक गंभीर होती है। इसलिए किसी भी बुद्धिमान व्यक्ति को ऐसा मार्ग नहीं अपनाना चाहिए।
