श्री-भगवान उवाच
अहम् भक्त-पराधीनो
ह्यस्वतंत्र इव द्विजा
साधुभिर्ग्रस्त-हृदयो
भक्तैर्भक्त-जन-प्रियः
मयि निर्बद्ध-हृदयाः
साधवः सम-दर्शनःवशे
कुर्वन्ति माम भक्त्या
सत्-स्त्रियाः सत्-पतिम् यथा
"भगवान ने ब्राह्मण से कहा: मैं अपने भक्तों के पूर्ण नियंत्रण में हूँ। वास्तव में, मैं बिल्कुल भी स्वतंत्र नहीं हूँ। क्योंकि मेरे भक्त पूरी तरह से भौतिक इच्छाओं से रहित होते हैं, मैं केवल उनके दिलों की कोर में ही विराजमान होता हूँ। मेरे भक्त की तो बात ही क्या, यहाँ तक कि जो लोग मेरे भक्तों के भक्त हैं, वे भी मुझे बहुत प्रिय हैं। जैसे पतिव्रता स्त्रियाँ अपनी सेवा से अपने सज्जन पतियों को नियंत्रित करती हैं, वैसे ही शुद्ध भक्त, जो सभी के समान हैं और हृदय की कोर में मुझसे पूरी तरह से जुड़े हुए हैं, मुझे अपने पूर्ण नियंत्रण में रखते हैं।" माथर-श्रुति में कहा गया है:
भक्तिर एवैनं नयति
भक्तिर एवैनं दर्शयति
भक्ति-वशः पुरुषो
भक्तिर एव भूयसी
"भक्ति जीव को परम प्रभु तक ले जाती है, और आत्मा को भगवान को देखने में सक्षम बनाती है। भगवान भक्ति द्वारा नियंत्रित होते हैं। इसलिए भक्ति सबसे गौरवशाली है।"
