श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 121
 
 
श्लोक  2.5.121 
সেবা-বিগ্রহের প্রতি অনাদর যার
বিষ্ণু-স্থানে অপরাধ সর্বথা তাহার
सेवा-विग्रहेर प्रति अनादर यार
विष्णु-स्थाने अपराध सर्वथा ताहार
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति भगवान के सेवक का अनादर करता है, वह निश्चित रूप से भगवान विष्णु का अपराध करता है।
 
One who disrespects the servant of the Lord certainly offends Lord Vishnu.
तात्पर्य
पूजनीय वस्तु को सेव्‍य-विग्रह कहा जाता है, या सेवा का उद्देश्य। जो उस पूजनीय वस्तु की सेवा करता है, उसे सेवक-विग्रह कहा जाता है या ईश्‍वर का सेवक व्यक्तित्‍व। स्‍वयं-रूप व्रजेंद्र नन्‍दन पूजा की शाश्‍वत वस्तु है और स्‍वयं-प्रकाश बलदेव पूजा का शाश्‍वत धाम है। अलंकार शास्‍त्र लिखने वालों की भाषा में, कृष्‍ण को विषय-विग्रह या पूजा की वस्तु कहा जाता है और बलदेव के नेतृत्‍व वाली उनकी ऊर्जाओं को आश्रय-विग्रह या सेवक-विग्रह, पूजा के धाम कहा जाता है। जो सेवक-विग्रह का अनादर करते हुए सेव्‍य-विग्रह का सम्‍मान करता है, वह कभी सेव्‍य-विग्रह को प्रसन्‍न नहीं कर सकता है, बल्कि उपेक्षा का पात्र बनता है और अपराधों के कीचड़ में गिर जाता है। आदि पुराण में यह कहा गया है:

ये मे भक्‍त-जनाः पार्थ

न मे भक्‍ताश्‍च ते जनाः

मद्-भक्‍तानां च ये भक्‍ता

ते मे भक्‍त-तमा मताः

"हे प्रिय पार्थ, जो लोग अपने को मेरा भक्‍त होने का दावा करते हैं वह मेरे भक्‍त नहीं हैं, लेकिन जो खुद को मेरे भक्‍तों का भक्‍त होने का दावा करते हैं, वे ही असल में मेरे भक्‍त हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)