श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 3: भगवान का मुरारी के घर में वराह रूप में प्रतिष्ठान और नित्यानंद से मिलन  »  श्लोक 156
 
 
श्लोक  2.3.156 
আর্যা তর্জা পডে প্রভু অরুণ-নযন
হাসিযা দোলায অঙ্গ, যেন সঙ্কর্ষণ
आर्या तर्जा पडे प्रभु अरुण-नयन
हासिया दोलाय अङ्ग, येन सङ्कर्षण
 
 
अनुवाद
लाल-लाल आँखों वाले भगवान कविताएँ सुनाते और हँसते थे, जबकि उनका शरीर संकर्षण की तरह आगे-पीछे हिल रहा था।
 
The red-eyed Lord recited poems and laughed, while his body swayed back and forth like Sankarshan.
तात्पर्य
शब्द आर्या कविता की एक पंक्ति को दर्शाता है। ये कविताएँ जिनकी पंक्तियों में निर्धारित से अधिक अक्षर होते हैं और जो निबंध भी नहीं होते हैं, उन्हें आर्या कहा जाता है। शब्द तर्ज आर्या को सहज रूप से रचित गीतों के रूप में दर्शाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)