श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 3: भगवान का मुरारी के घर में वराह रूप में प्रतिष्ठान और नित्यानंद से मिलन  »  श्लोक 130
 
 
श्लोक  2.3.130 
আজানুলম্বিত ভুজ সুপীবর বক্ষ
চলিতে কোমল বড পদ-যুগ দক্ষ
आजानुलम्बित भुज सुपीवर वक्ष
चलिते कोमल बड पद-युग दक्ष
 
 
अनुवाद
उनके दोनों हाथ घुटनों तक फैले हुए थे, उनकी छाती ऊँची थी, उनके दोनों कोमल कमल जैसे चरण गति में निपुण थे।
 
His hands were stretched out to his knees, his chest was high, and his two soft, lotus-like feet were adept at movement.
तात्पर्य
उसके दोनों हाथ नीचे घुटनों तक फैले हुए थे, और उनका सीना ऊंचा था। यद्यपि उनके कमल पैर अत्यंत कोमल थे, परन्तु चलने के कार्य में वे बहुत ही निपुण थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)