श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 28: भगवान का संन्यास ग्रहण लीला  »  श्लोक 148
 
 
श्लोक  2.28.148 
প্রেম-রসে পরম চঞ্চল গৌরচন্দ্র
স্থির নহে নিরবধি ভাব অশ্রু কম্প
प्रेम-रसे परम चञ्चल गौरचन्द्र
स्थिर नहे निरवधि भाव अश्रु कम्प
 
 
अनुवाद
श्री गौरचन्द्र प्रेमोन्मत्त होकर अत्यन्त व्याकुल हो रहे थे। वे निरन्तर आँसू बहा रहे थे और उनका शरीर काँप रहा था।
 
Shri Gaurchandra was overcome with love and was becoming extremely distraught. He was constantly shedding tears and his body was trembling.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)