श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 28: भगवान का संन्यास ग्रहण लीला  »  श्लोक 115
 
 
श्लोक  2.28.115 
অকথ্য অদ্ভুত ধারা প্রভুর নযনে
তাহা না কহিতে পারে ঽঅনন্তঽ বদনে
अकथ्य अद्भुत धारा प्रभुर नयने
ताहा ना कहिते पारे ऽअनन्तऽ वदने
 
 
अनुवाद
भगवान के नेत्रों से अवर्णनीय अद्भुत आँसुओं की धारा बह रही थी, जिसका वर्णन भगवान अनन्त भी नहीं कर सकते थे।
 
An indescribable and wonderful stream of tears was flowing from the eyes of the Lord, which even Lord Anant could not describe.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)