श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 27: भगवान का वियोग भाव को शांत करना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  2.27.28 
তুমি ধর্ম-ময যদি জননী ছাডি
বাকে-মতে জগতে তুমি ধর্ম বুঝাইবা?”
तुमि धर्म-मय यदि जननी छाडि
बाके-मते जगते तुमि धर्म बुझाइबा?”
 
 
अनुवाद
"आप धार्मिक सिद्धांतों के साक्षात् स्वरूप हैं, फिर भी आप अपनी माँ को छोड़ देंगे? फिर आप इस संसार में धार्मिक सिद्धांत कैसे सिखाएँगे?"
 
"You are the embodiment of religious principles, yet you will abandon your mother? Then how will you teach religious principles in this world?"
तात्पर्य
श्री गौरासुन्दर धर्म के प्रचारक तथा धर्म के साक्षात् अवतार थे, इसलिए माता शची यह जानना चाहती थीं कि धर्म की रक्षा के लिए वह अपनी माँ की सेवा का त्याग करके कैसे धर्म की रक्षा करेंगे। भगवत धर्म के इस सिद्धांत को प्रकट करने के उद्देश्य से कि ''स वै पुंसां परो धर्मः'' अर्थात ''सभी मानवों के लिए सर्वोच्च कर्म है,'' माता शची के मुँह से यह प्रश्न निकला। ईश्वर की भक्ति करना सांसारिक धर्मों से श्रेष्ठ है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)