श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 27: भगवान का वियोग भाव को शांत करना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  2.27.20 
মূর্চ্ছিত হৈযা ক্ষণে পডে পৃথিবীতে
নিরবধি ধারা বহে, না পারে রাখিতে
मूर्च्छित हैया क्षणे पडे पृथिवीते
निरवधि धारा वहे, ना पारे राखिते
 
 
अनुवाद
वह बार-बार बेहोश होकर जमीन पर गिर रही थी और अपनी आंखों से बहते आंसुओं को रोक नहीं पा रही थी।
 
She was repeatedly falling unconscious on the ground and was unable to stop the tears flowing from her eyes.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)