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श्लोक 2.26.59  |
বিজযেরে কৃপা,—শুক্লাম্বরান্ন-ভোজন
ইহার শ্রবণে মাত্র মিলে ভক্তি-ধন |
विजयेरे कृपा,—शुक्लाम्बरान्न-भोजन
इहार श्रवणे मात्र मिले भक्ति-धन |
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| अनुवाद |
| विजया पर की गई कृपा और शुक्लम्बर के चावल की स्वीकृति के विषय में सुनकर, मनुष्य भक्ति की संपत्ति प्राप्त करता है। |
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| Hearing about the grace bestowed upon Vijaya and the acceptance of the rice of Shuklambara, one acquires the wealth of devotion. |
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