श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 26: शुक्लाम्बर और विजय पर कृपा का वर्णन और भगवान की संन्यास की इच्छा  »  श्लोक 145
 
 
श्लोक  2.26.145 
বিধি বা নিষেধ কে তোমারে দেতে পারে
সেই সত্য, যে তোমার আছযে অন্তরে
विधि वा निषेध के तोमारे देते पारे
सेइ सत्य, ये तोमार आछये अन्तरे
 
 
अनुवाद
"तुम्हें कौन बता सकता है कि क्या करो और क्या न करो? तुम्हारे हृदय में जो कुछ है, वह अवश्यंभावी है।"
 
"Who can tell you what to do and what not to do? Whatever is in your heart is inevitable."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)