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श्लोक 2.25.89  |
পুনঃ প্রেমানন্দ-জলে তিতে সে বসন
পুনঃ বাহিরাই অঙ্গ করে প্রক্ষালন |
पुनः प्रेमानन्द-जले तिते से वसन
पुनः बाहिराइ अङ्ग करे प्रक्षालन |
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| अनुवाद |
| तब उनका वस्त्र पुनः प्रेम के आँसुओं से भीग जाता और वे पुनः बाहर जाकर स्वयं को शुद्ध करते। |
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| Then his clothes would again become wet with tears of love and he would again go out and purify himself. |
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