श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 24: भगवान का अद्वैत को अपना विश्वरूप का प्रदर्श  »  श्लोक 82
 
 
श्लोक  2.24.82 
হেন জাতি নাহি, না খাইলা যার ঘরে
ঽজাতি আছেঽ, হেন কোন্ জনে বলে তোরে?
हेन जाति नाहि, ना खाइला यार घरे
ऽजाति आछेऽ, हेन कोन् जने बले तोरे?
 
 
अनुवाद
"तुम किसी के भी घर में बिना उसकी जाति देखे खाना खाते हो। कौन कह सकता है कि तुमने अपनी जाति बनाए रखी है?"
 
"You eat food in anyone's house without looking at their caste. Who can say that you have maintained your caste?"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)